Tuesday, December 29, 2020

Sant kabir saheb ji ki dohe-hindi

sd.mahant
                                           Sant Kabir Saheb Ji 

1-माला फेरत जुग गया, मिटा न मन का फेर । 
                      कर का मनका डारि कै, मन का मनका फेर । । 
अर्थ - कबीर दास जी कहते हैं कि माला जपने वाले सांसारिक लोगो, तुम्हें इस काष्ठ की माला को फेरते हुए युग बीत गए, परन्तु तुम्हारे मन के भावों मे परिवर्तन नहीं आया । मन के विकार यथावत बने रहे, तो ऐसी माला जपने से क्या लाभ ? इसलिए तुम अपने हाथ में धारण की हुई इस माला को फेंककर के अपने मन रूपी दाने को बदलो, अर्थात अंतः करण की शुध्द्ता से ही समाज में परिवर्तन आएगा । 

2-ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोइ । 
   अपना तन सीतल करै, औरन को सुख होइ । । 
अर्थ - कबीर दास जी कहते है कि हमे हमेशा ऐसी वाणी [वचन ] बोलनी चाहिए, जिससे कि मन का कष्ट दूर हो जावे । मीठी-मधुर वाणी दूसरों को तो शांति देती है,साथ ही अपने मन  को भी शीलता का अनुभव होता है ।

3 यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ,
ढबका लागा फुटिगा, कुछ न आया हाथ।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि यह शरीर कच्चा घडा है जिसे तू साथ लिए घूमता फिरता था। जरा सी चोट लगते ही यह फूट गया। कुछ भी हाथ नहीं आया।

4 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ: बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

5 माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या  फेरो।

6 कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।

अर्थ:कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए। बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

7 कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता ह                                                              8 कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई ।                                           अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥

अर्थ: कबीर कहते हैं – प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा  – जिससे अंतरात्मा  तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया – खुश हाल हो गया – यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है ! हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते ! 

9 कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि ।
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि ॥

अर्थ: यह शरीर लाख का बना  मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं.यह चार दिन का खिलौना है कल ही नष्ट हो जाएगा. शरीर नश्वर है – जतन करके मेहनत  करके उसे सजाते हैं तब उसकी क्षण भंगुरता को भूल जाते हैं किन्तु सत्य तो इतना ही है कि देह किसी कच्चे खिलौने की तरह टूट फूट जाती है – अचानक ऐसे कि हम जान भी नहीं पाते !

10 कबीर संगति साध की , कड़े न निर्फल होई ।
चन्दन होसी बावना , नीब न कहसी कोई ॥

अर्थ: कबीर कहते हैं कि साधु  की संगति कभी निष्फल नहीं होती. चन्दन का वृक्ष यदि छोटा – (वामन – बौना ) भी होगा तो भी उसे कोई नीम का वृक्ष नहीं कहेगा. वह सुवासित ही रहेगा  और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा. आपने आस-पास को खुशबू से ही भरेगा                                                                

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Thursday, December 24, 2020

सत्य कबीर साहेब जी की दोहे-

                                     कबीर साहेब जी की दोहे

* सतगुरु की महिमा .अनंत, अनंत किया उपकार l

    लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार  ll 

अर्थ-महात्मा कबीरदास गुरु की  महिमा बताते हुए कहते हैं कि  सतगुरु की  महिमा का  कोई अंत नहीं है, यह अनंत है, गुरु के  दुवारा किए गये उपकार भी असीम है, क्योंकि  इन्होने  अपने  ज्ञान  रूपी  सद्उपदेशों  से मेरी आंखो को  खोल दिया है अर्थात मेरी आँखों  से भ्रम के पर्दे को हटा दिया है  तथा मुझे ईश्वर के  दर्शन भी गुरु की कृपा से हो गये l

                                                                                                       * सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप l

      जाके हिरदे  सांच है, ताके हिरदे आप ll

                                                                                              अर्थ- संत कबीर दास जी  कहते  हैं कि सच्चाई के   बराबर  कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने के बराबर कोई पाप नहीं है l वे कहते हैं कि जो व्यक्ति सच बोलता है अर्थात जिसके हृदय में सत्य का निवास होता है .  वहाँ पर स्वयं ईश्वर निवास करता है अर्थात सत्य बोलने वाले के हृदय में ईश्वर का निवास होता है । 

                                                                                                               * गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाँय । 

     बलिहारी गुरु आपकी जो गोविंद दियो बताय । । 

                                          अर्थ - कबीर दस जी कहते हैं कि मेरे सामने 

 गुरु और ईश्वर दोनों ही खड़े हैं । अब मैं दोनों मे से पहले किसकी चरण वन्दना करूँ । कबीर दस जी के अनुसार गुरु की महिमा अपार है । गुरु शिष्य को ज्ञान प्रदान करता है और उसका पथ -प्रदर्शन करता है । गुरु के बिना ईश्वर के दर्शन असम्भव है । यदि गुरु नहीं हो ,तो गोविंद कहाँ ? इस दृष्टि से कबीर दास जी गुरु को गोविंद [भगवान ]से भी ऊँचा स्थान प्रदान करते हैं और कहते हैं कि आपके मार्ग -दर्शन से मैंने ईश्वर को पहचाना है ।

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      यह ऐसा संसार है , जैसा सेंबल फूल । 

         दिन दस के व्योहार कौ , झूठै रंगि न भूलि । । 

      अर्थ-संत कबीर  जी कहते हैं कि यह संसार सेंबल के फूल के समान तत्वहीन क्षण-स्थायी एवं भ्रम में डालने वाला है । यह जगत केवल दस दिन का व्यवहार है । इस संसार के क्षणिक एवं झूठे आकर्षण मे जीव [मनुष्य ] को अपना वास्तविक स्वरूप नहीं भूलना चाहिए । 

                                                                                       

 * माखी गुढ़ पर गड़ी रहै , पंख रहूयो लपटाय । 

     हाथ -मलै अरु सिर धुनै , लालच बुरी बलाय । । 

                    अर्थ - संत कबीर दास जी कहते हैं कि  मक्खी  मीठे  के लोभ मे गुड से  लिपट गई   है उसके   पंख उसके चैप  से चिपक गये हैं । वह सिर धुनती  है ,  हाथ मलती है और छटपटा रही है , अब उसमें उड़ने  की शक्ति नहीं रह गई है । तब वह  पश्चाताप करती है कि , लोभ बहुत  ही बुरी  चीज है , यदि वह मीठे का लालच नहीं करती तो उसकी  यह दशा  नहीं होती   ।


👆 हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना, आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मरे, मरम न जाना कोई।

र्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि हिन्दुओं को राम प्यारा है और मुसलमानों को रहमान। इसी बात पर वे आपस में झगड़ते रहते है लेकिन सच्चाई को नहीं जान पाते। 

                       *  पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़,
                   घर की चाकी कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि अगर पत्थर की मूर्ति की पूजा करने से भगवान मिल जाते तो मैं पहाड़ की पूजा कर लेता हूँ। उसकी जगह कोई घर की चक्की की पूजा कोई नहीं करता, जिसमें अन्न पीसकर लोग अपना पेट भरते हैं।

                   * चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए,
               वैद बेचारा क्या करे, कहा तक दवा लगाए।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि चिंता आईटीआई चोर है कि यह किसी के भो दिल को खा जाती है। कोई डॉक्टर भला क्या कर सकता है? उसकी दवा कितनी दूर तक मदद कर पाएगी?

          * जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई,
           जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला ग्राहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है। पर जब ऐसा ग्राहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।

                           *  माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया शरीर,
                             आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।

                         * कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी,
                          एक दिन तू भी सोवेहा, लंबे पांव पसारी।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान के प्रकाश को हासिल कर प्रभु का नाम लो। सजग होकर प्रभु का ध्यान करो। वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निंद्रा में सो ही जाना है, जब तक जाग सकते ही जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते?

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                    झूठे सुख को सुख कहे, मंत है मन मोद,
                खल्क चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि अरे ओ जीव! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख तेरा यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा हुआ है।

इस संसार में इंसान को जीवन बड़ी आसानी से नहीं मिलता इसे बड़े पापड़ बेलने पड़ते है, तो अपनी जिंदगी हसी खुशी जियो।

                                   ऐसा कोई न मिले, हमको दे उपदेश,
                            भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि सांसारिक लोगों के लिए दुखित हिते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों के केश पकड़कर निकाल लेता।

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Sant kabir saheb ji ki dohe-hindi

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