Thursday, December 24, 2020

सत्य कबीर साहेब जी की दोहे-

                                     कबीर साहेब जी की दोहे

* सतगुरु की महिमा .अनंत, अनंत किया उपकार l

    लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार  ll 

अर्थ-महात्मा कबीरदास गुरु की  महिमा बताते हुए कहते हैं कि  सतगुरु की  महिमा का  कोई अंत नहीं है, यह अनंत है, गुरु के  दुवारा किए गये उपकार भी असीम है, क्योंकि  इन्होने  अपने  ज्ञान  रूपी  सद्उपदेशों  से मेरी आंखो को  खोल दिया है अर्थात मेरी आँखों  से भ्रम के पर्दे को हटा दिया है  तथा मुझे ईश्वर के  दर्शन भी गुरु की कृपा से हो गये l

                                                                                                       * सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप l

      जाके हिरदे  सांच है, ताके हिरदे आप ll

                                                                                              अर्थ- संत कबीर दास जी  कहते  हैं कि सच्चाई के   बराबर  कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने के बराबर कोई पाप नहीं है l वे कहते हैं कि जो व्यक्ति सच बोलता है अर्थात जिसके हृदय में सत्य का निवास होता है .  वहाँ पर स्वयं ईश्वर निवास करता है अर्थात सत्य बोलने वाले के हृदय में ईश्वर का निवास होता है । 

                                                                                                               * गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाँय । 

     बलिहारी गुरु आपकी जो गोविंद दियो बताय । । 

                                          अर्थ - कबीर दस जी कहते हैं कि मेरे सामने 

 गुरु और ईश्वर दोनों ही खड़े हैं । अब मैं दोनों मे से पहले किसकी चरण वन्दना करूँ । कबीर दस जी के अनुसार गुरु की महिमा अपार है । गुरु शिष्य को ज्ञान प्रदान करता है और उसका पथ -प्रदर्शन करता है । गुरु के बिना ईश्वर के दर्शन असम्भव है । यदि गुरु नहीं हो ,तो गोविंद कहाँ ? इस दृष्टि से कबीर दास जी गुरु को गोविंद [भगवान ]से भी ऊँचा स्थान प्रदान करते हैं और कहते हैं कि आपके मार्ग -दर्शन से मैंने ईश्वर को पहचाना है ।

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      यह ऐसा संसार है , जैसा सेंबल फूल । 

         दिन दस के व्योहार कौ , झूठै रंगि न भूलि । । 

      अर्थ-संत कबीर  जी कहते हैं कि यह संसार सेंबल के फूल के समान तत्वहीन क्षण-स्थायी एवं भ्रम में डालने वाला है । यह जगत केवल दस दिन का व्यवहार है । इस संसार के क्षणिक एवं झूठे आकर्षण मे जीव [मनुष्य ] को अपना वास्तविक स्वरूप नहीं भूलना चाहिए । 

                                                                                       

 * माखी गुढ़ पर गड़ी रहै , पंख रहूयो लपटाय । 

     हाथ -मलै अरु सिर धुनै , लालच बुरी बलाय । । 

                    अर्थ - संत कबीर दास जी कहते हैं कि  मक्खी  मीठे  के लोभ मे गुड से  लिपट गई   है उसके   पंख उसके चैप  से चिपक गये हैं । वह सिर धुनती  है ,  हाथ मलती है और छटपटा रही है , अब उसमें उड़ने  की शक्ति नहीं रह गई है । तब वह  पश्चाताप करती है कि , लोभ बहुत  ही बुरी  चीज है , यदि वह मीठे का लालच नहीं करती तो उसकी  यह दशा  नहीं होती   ।


👆 हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना, आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मरे, मरम न जाना कोई।

र्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि हिन्दुओं को राम प्यारा है और मुसलमानों को रहमान। इसी बात पर वे आपस में झगड़ते रहते है लेकिन सच्चाई को नहीं जान पाते। 

                       *  पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़,
                   घर की चाकी कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि अगर पत्थर की मूर्ति की पूजा करने से भगवान मिल जाते तो मैं पहाड़ की पूजा कर लेता हूँ। उसकी जगह कोई घर की चक्की की पूजा कोई नहीं करता, जिसमें अन्न पीसकर लोग अपना पेट भरते हैं।

                   * चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए,
               वैद बेचारा क्या करे, कहा तक दवा लगाए।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि चिंता आईटीआई चोर है कि यह किसी के भो दिल को खा जाती है। कोई डॉक्टर भला क्या कर सकता है? उसकी दवा कितनी दूर तक मदद कर पाएगी?

          * जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई,
           जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला ग्राहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है। पर जब ऐसा ग्राहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।

                           *  माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया शरीर,
                             आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।

                         * कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी,
                          एक दिन तू भी सोवेहा, लंबे पांव पसारी।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान के प्रकाश को हासिल कर प्रभु का नाम लो। सजग होकर प्रभु का ध्यान करो। वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निंद्रा में सो ही जाना है, जब तक जाग सकते ही जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते?

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                    झूठे सुख को सुख कहे, मंत है मन मोद,
                खल्क चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि अरे ओ जीव! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख तेरा यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा हुआ है।

इस संसार में इंसान को जीवन बड़ी आसानी से नहीं मिलता इसे बड़े पापड़ बेलने पड़ते है, तो अपनी जिंदगी हसी खुशी जियो।

                                   ऐसा कोई न मिले, हमको दे उपदेश,
                            भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि सांसारिक लोगों के लिए दुखित हिते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों के केश पकड़कर निकाल लेता।

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